फ़ोकस

जिंदगी में कितना फोकस चाहिए होता है। हर कोई आपसे फ़ोकस पर बात कर सकता है। लेक्चर दे सकता है। आपको तरह-तरह के योग, प्राणायाम बताएगा। इस चक्कर में कितना तंग हो जाता है आदमी।

चश्मा उतार कर रख देता हूं मैं। अब कुछ धुंधलापन है सामने। सब दिख रहा है, पहचान भी आ रहा है- खिड़की है, बल्ब है, किताबें हैं, पर सब कुछ धुंधलापन के साथ। मुझे दूर-दृष्टि दोष है।

सड़क पर निकल आता हूँ मैं। पैदल चलता हूं।सब कुछ नज़र आ रहा है पर धुंधला-धुंधला।

कितना जरूरी हो जाता है ना कभी-कभी फ़ोकस खो देना। ‘मैं’ का धुंधला हो जाना।

Women’s Day

आज इन चेहरों का दिन है। इन्हें शुक्रिया अदा करने का दिन।
वो गुठली जो मिट्टी के अंदर दबी रही इन्होंने उसे खाद-पानी दिया, भरोसा दिया, हौसला अफजाई की।और अब जब ये गुठली मिट्टी से ऊपर आकर पौधे से वृक्ष होने की ओर अग्रसर है, अपनी जड़ें जमा रहा है तो इन सभी ने अपनी नज़र लगा रखी है। ख़ुश होते रहते हैं इसकी बढ़ती लंबाई और गहराती जड़ें देखकर या फिर जब आती हैं इसमें पत्तियां नई।
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आज महिला सशक्तिकरण का बोलबाला है हर तरफ़ । मेरे लिए महिला सशक्तिकरण का सीधा सा मतलब ये है कि महिलाएं सशक्तिकरण करें पुरुषों का ताकि मेरी तरह हर गुठली वृक्ष बन सके।

करेले की सब्ज़ी

लोग कवि को उदास देखकर ये मान लेते हैं कि की अब तो ये कविता लिखेगा। पर इंसानी तौर पर एक कवि को हुए दु:ख को नज़रंदाज़ करते हैं। उसके भीतर भी एक इंसान है, जोकि लगातार नज़रंदाज़ हो रहा होता है।
और जमा होने लगती है कड़वाहट उसके भीतर और शायद इसलिए पसंद नहीं उसे करेले की सब्ज़ी।पर जब उसके थाली में परोस दी जाती है करेले की सब्ज़ी तू वो मना नहीं करता, ले लेता है, पर खाता नहीं। नकारना चाहता है उसे।

फिर लिया क्यों?

पता नहीं!

और जब कभी नकार नहीं पता है तो सब्ज़ी से आलू चुनकर खा लेता है, पर करेले को छूता भी नहीं।

और फिर बताता फिरता है सबको कविता को माध्यम बनाकर, की पसंद नहीं उसे करेले की सब्ज़ी।

बदलाव का

यह दौर है बदलाव का

पत्थरों के पथराव का

युवकों के भटकाव का

ख़ून के छिंटकाव का

चारों तरफ अलगाव का

जलती अलाव का

इंसानियत पर गहराते दबाव का

यह दौर है बदलाव का

क्या वाकई ये दौर है बदलाव का?